Wednesday, 27 April 2016

आखरी सांस

रिश्ते यूँ ही नहीं बिखर जाते है एक दिन में, एक पल में..
कांच के बर्तन की तरह टूट कर अचानक चकनाचूर नही होते ...
गलतफमियों, ख़ामोशी के दीमक आहिस्ता आहिस्ता
बसने लगते है रिश्तों की दरारों में,
और दरारें कभी ना भर सकने वाली खाई में बदल जाती है,
फिर अहं के गिद्द नोंचने लगते है बरसों से बुने ख्वाबों को,
कतरा कतरा दम तोड़ते हैं रिश्ते प्यार, समझ, भरोसे की कमी में,
फिर भी उम्मीद की डोर से बंधे बरसों तक किसी बीमार की तरह
बिस्तर पर पड़े रहते है एक शीशी इंतज़ार के सहारे,
पर जिस दिन ये उम्मीद अपनी आखरी सांस लेती है न
उसके साथ ही दम तोड़ देता है रिश्ता भी फिर कभी न जुड़ पाने के लिए...
मेरे अंदर भी आज ऐसी ही एक उम्मीद ने अपनी आखरी सांस ली है....

Saturday, 2 April 2016

यूँ ही कुछ भी.....


शब्द इधर उधर बिखर रहे है, ख्याल कोई मुक्कमल शक्ल सूरत नहीं पा रहे। जो बातें कही जा सकती है वो सामने आने में डरती है, वो कोना पकड़ कर छुपने में अब माहिर हो चुकी है और मैं जिद्दी अब भी कुछ लिख डालने कुछ कह डालने की जिद्द पर अड़ी हूँ, ऐसे रास्ते खोजने में जुटी हूँ जिससे जो अंदर है वो बाहर आ सके।  क्यूंकि जैसे भी हो उल्टा फुल्टा, आधा- अधूरा, टुटा फूटा।  जैसे भी हो बस अंदर का गुबार बाहर निकलना बेहद जरुरी है, जो बातें कही जानी चाहिए उन्हें कांपते होंटो से या रूकती सांसो से जैसे भी हो कह देना जरुरी है, वरना ना कहने की आदत हो जाती है चाहे सही हो या गलत कुछ न करने की फितरत बन जाती है इसीलिए कहना जरुरी है, लिखना जरुरी है, व्यक्त करना जरुरी है और खुद में खुद को कहीं न कहीं बचाए रखना उससे भी ज्यादा जरुरी है। 

Monday, 28 March 2016

कि दुःख की पराकाष्टा भी विकारों को जला देती है.....

जिंदगी भी एक गुरुर है।  हमारी जिंदगी, हमारे अपनों की जिंदगियां सब कुछ हमारे अंदर एक गुरुर को जन्म देती है और जिंदगी के इस गुरुर में चूर होकर हम ये अक्सर भूल जाते है कि ये जिंदगी हमारे पास बस एक अमानत है इसपर हमारा कोई अधिकार नहीं ये हमारे इशारों पर चलती और रूकती नहीं इसके अपने ही कायदे है, फैसले हैं, जो हम सब मानने को बेबस है। पर जब तक ये है तब तक सब कुछ हमारी मुठ्ठी में है, ख़ुशी है, इच्छाएं है , आकांक्षाएं है , अपेक्षाएं है और जो हमारे अनुरूप नहीं है उसकी खीज है, मलाल है, असंतुष्टता है, जो हासिल है उसका अहंकार है। पर जब ये जिंदगी ही हाथ से फिसलने लगे तब? तब किस चीज के पीछे भागेंगे हम, किस बात की शिकायत पूरी कायनात से करेंगे ? सारी उम्र जो अहंकार, जो स्वार्थ का लिबास ओढ़े थे उसका क्या हासिल?

जब अपनी आँखों के आगे किसी अपने की जिंदगी रेत की तरह तेज़ी से फिसलने लगती है, तो दुनिया की हर चीज़ बेमानी, बेमतलब हो जाती है, हर वो चीज़ जिस के बल पर खुद को खुदा समझने की भूल करते रहे थे वो सब अचानक मिटटी का ढेर लगने लगती है।  किसी को खोने का डर अक्सर जिंदगी की हकीकत समझा जाता है।  आई सी यू में जब जिंदगी और मौत का खेल चल रहा हो तो बाहर बैठे इस बात की फ़िक्र नहीं होती की शेयर मार्किट चढ़ा या गिरा, घर गिरवी है या जमीन जायदाद बिक गई? मिलने मिलाने वालो ने हमेशा की तरह अदब से सलाम किया या चार फिकरे कसे? दुःख की आग में धीरे धीरे पैसा, रुतबा, गुरुर, अहंकार सारे चोगे धू धू कर जलने लगते है और अंदर का वो इंसान बाहर निकलता है जो वक़्त के हाथों की बस एक कठपुतली है। पहले खूब गुस्सा आता है, सब से नाराजगी होने लगती है जी चाहता है दुनिया राख कर दें पर दुनिया को राख करने से भी उस एक इंसान की जिंदगी तो नहीं बक्शी जा सकती है। फिर वो गुस्सा भी धीरे धीरे पिघलने लगता है। कायनात से की गई शिकायतें फरियाद में बदल जाती है।  उम्मीद फिर भी नहीं टूटती क्यूंकि जिंदगी टूटने और हारने की इजाजत नहीं देती।  जिंदगी ताकत देती है कोशिश करते रहने की, हौसले से हर दुःख का सामना करने की।  जब तक साँसे है तब तक जिंदगी है, जब तक जिंदगी है तब तक उम्मीद है और जब तक उम्मीद है तब तक रास्ते खुदबखुद मिलते जाते है, मंजिले मिले न मिले चलना और चलते रहना एकमात्र विकल्प है। 

पर क्या ये जरुरी है किसी को खोने के दुःख में ही जिंदगी की कीमत को समझा जाये? क्या मौत का दुःख ही विकारों से हमें आजादी दिला सकता है ? क्या जिंदगी में इतना माद्दा नहीं के उसके होते हुए उसकी कीमत को पहचान लिया जाये? जब तक सांसे चलती है तब तक जरा सी जिंदगी भी जिन्दा भी रहें तो मुस्कुराहटें भी आबाद रहेगी।  

Saturday, 21 March 2015

कि वादे तोड़ने के लिए ही किये जाते है.......

एक वक़्त था जब इस जुमले से मुझे ख़ूब चिढ़ मचती थी, लगता था उस शख़्स को कहीं से ढूंढ लाऊँ और सरेआम सूली पर लटका दूँ जिसने ये बेहूदा बात पहली बार कही होगी। पर कमाल तो ये है कि हमने भी इसे हर ज़बान तक ऐसी शान से पहुँचाया जैसे ये जुमला कोई लाइसेंस है अपनी बातों से बार बार मुकर जाने का, अपनी जिम्मेदारियों से भागने का ।
खेर अपनी कहूँ तो स्कूल कॉलेज में तो मेरा ये हाल था कि किसी के  मुँह से ये बात सुन ली तो आधे घंटे के लंबे लैक्चर से पहले वहां से हिलती नहीं थी। फिर धीरे धीरे दुनियाँ को ज़िन्दगी के चश्में से देखने का सिलसिला शुरू हुआ और अहसास हुआ कि वाकई कुछ वादों का टूट जाना पहले से ही तय होता है पर वो इसलिए नहीं कि उन वादों का निभाया जाना मुमकिन नही बल्कि इसलिए कि हम में सच बोलने की ताकत नहीं होती अंजाम जानते हुए भी जूठे वादे करना हमारी आदत में शुमार हो जाता है । और इस आदत का सबसे ज्यादा खामियाज़ा भी हमें ही भुगतना होता है, दूसरे हमारे किये गए जूठे वादों से बेअसर बचने का हुनर सीख लेते है। पर खुदसे हर रोज़ किये वादे और उन्हें न निभाए जाने के गिल्ट से बचना आसान नहीं होता।
मैंने भी कई बार इस जुमले के सहारे अपनी रातों को बचाया है ।
अब सोचती हूँ कहीं से ढूंढ लाऊँ उस शख़्स को जिसने खुदसे बचने का ये बेजोड़ नुस्ख़ा इज़ाद किया ।

कभी कभी आधी रात को पानी पीने के बहाने से उठकर बाक़ी रात करवटें बदलकर इसकी कीमत चुकानी पड़ती है और ऐसे में खुदको तस्सल्ली देंने के लिए सिर्फ ऐसे बेहूदा जुमले ही काम आते है।
एक बार उसे शुक्रिया करना तो बनता ही है।

Friday, 6 February 2015

कितनी जंग लड़े हर रोज़.......

पिछले कई दिनों से सुबह अख़बार उठाते ही जो पहली खबर अपनी ओर ध्यान खींचती वो होती स्वाइन फ़्लू का कहर जो अब हमारे प्रदेश, हमारे अपने शहर में दस्तक दे चुका था। हर रोज़ मरने वालों और नए H1N1 पॉजिटिव की संख्या बढ़ती ही जा रही है जैसे कोई होड़ लगी हो और ये फ्लू सभी को अपनी चपेट में लेकर ही मानेगा। शहर के अस्पतालों में डॉक्टर्स और मरीजों दोनों के हाल ख़राब थे जरा सा जुकाम होता और सब सीधा अस्पताल का रुख करते , दवाइयाँ काम पड़ रहीं थी, वैक्सींस खत्म हो गए और डर बढ़ता ही जा रहा था। इससे पहले भी कई बार ये कहर बरस चुका है पर हमारे शहर में ऐसा पहली बार हो रहा था तो डर और मिथ दोनों ही ज्यादा थे।
कपूर और ईलायची सूँघो…….
आयुर्वेदिक काढ़ा पियो……..
तुलसी के पत्ते चबाओ……..
किसी से हाथ ना मिलाओ……..


शादी यां मौत पर मत जाओ……..
नीम के पत्ते घर में लटकाओ…………
कोई जुकाम वाला घर आ जाये तो उसे तुरंत भेज दो......
घर का कोना कोना साफ करो ……
अंतहीन हिदायतें .........
हाल ये हुआ कि मिर्च के छौंक से भी किसी को छींक आती तो दिल बैठ जाता। घर दिन में कई बार डेटोल फिनाइल से साफ किया जाने लगा, बाहर आना जाना कम हो गया ……
सोचती हूँ इस फ़्लू को क्या पड़ी थी हमारे देश में आने की क्या वैसे ही जान की आफ़ते यहाँ कम है?आतंकवाद, भ्रष्टाचार, ग्लोबल वार्मिंग तो खेर बहुत बड़ी बड़ी बातें है..... यहाँ तो रोड पर चलो तो सरफिरे ड्राइवर्स जो खुदको और हमें मारने की सुपारी लेकर ही घर से निकलते है उनसे भी खतरा... दो वक़्त की रोटी में भी ज़माने भर की मिलावट का खतरा। दूध पीते है तो ना चाहते हुए भी कपड़े धोने के सर्फ और साबुन की महक आ जाती है, और उसपर हमारी लाइफस्टाइल तो खेर बोनस है ही ....
आपके मेरे जैसा आम इंसान आखिर हर रोज़ कितनी जंग लड़ेगा? एक एक सांस के लिए जंग, एक सच्ची मुस्कराहट के लिए जंग, चिंता मुक्त एक नींद के लिए जंग.... 
और अब इस मरे स्वाइन फ़्लू से भी जंग.....
हाय ……
आज सुबह से जुकाम था इसलिए सोचा जल्दी जल्दी अपने मन की बात तो लिख दूँ, पर कुछ ज्यादा ही लिख दिया, वैसे दो अदरक वाली चाय से जुकाम जैसे आया था वैसे ही चला भी गया। 
शायद आज भर की जंग तो मैंने जीत ही ली है ...... :-)

Thursday, 15 January 2015

एक ख्याल

आज सुबह जब आँख खुली तो यूँ ही एक ख्याल आया कि पूरी दुनियां में कितने ऐसे लोग होंगे जो आज का सवेरा नहीं देख पाये होंगे ।
रात के दामन में हॉस्पिटल के बेड पर किसी सामान की तरह पड़े पड़े यां घर में परिवार से घिरे अपने अंदर उठती किसी अजीब सी तकलीफ से अकेले लड़ते हुए जिन्होंने अपनी आखरी सांस ली होगी । शायद काले साये उन्हें ले गए होंगे यां रौशनी के चमकते टुकड़े ने उन्हें अपनी तरफ खींचा होगा, कौन जाने? जो गए तो कितनी ही कहानियां अधूरी छोड़ गए, कितनी ही बातें अनकही रह गई, कितने ही ख्वाब कभी मुकमल ही नहीं हुए। 
फिर भी अँधेरी रात के बाद फिर चमकती सुबह हुई और इस सुबह में हम जैसे करोड़ों अरबों लोगों ने आँखे खोलीं हैं । तो क्या हमें शुक्रिया अदा नही करना चाहिए ? हम वो खुशनसीब लोग हैं जिन्हें फिर से ये खूबसूरत दिन नसीब हुआ है कितनी ही अधूरी कहानियों, अनकही बातों और ख़्वाबों को मुक्कमल करने का एक और मौका मिला है ।

Tuesday, 23 December 2014

एक बेनाम बस्ती

शहर के सबसे पॉश इलाके में बने आलिशान मॉल के पास खाली पड़ी सरकारी ज़मीन पर अवैध तरह से बनी थी वो बेनाम बस्ती। कारीगर रहते थे वहां .... शायद कारीगर कहना ही ठीक होगा उन्हें । साल भर अपने हाथों से कुछ ना कुछ बनाते और पास फुटपाथ पर ही बेचते। कभी तरह तरह के खिलोने तो कभी बेंत की कुर्सियां और मेज़, नवरात्रों में माँ दुर्गा की मूर्तियाँ तो गणेश उत्सव पर गणेश की मूर्तियां । जो भी बनाते उसमें जान फूंक देते । फिर भी ना उन्हें इस शहर में वो सम्मान मिला ना सर पर छत। जहाँ जाते किराये पर घर खरीदने वहीँ से बेइज़्ज़त करके निकाल दिए जाते क्योंकि शहर शहर भटकते थे वो लोग उनका कोई एक ठिकाना नहीं था लिहाज़ा इस तरह सरकारी ज़मीन पर लकड़ियों और बरसाती के सहारे कई झोंपड़ियाँ बन गई और 20-25 झोंपड़ियों ने मिलकर छोटी बस्ती की शक्ल ले ली । बेनाम और अस्तित्वहीन बस्ती जिसे आते-जाते सब हिक़ारत भरी नज़रों से देखते हैं , जैसे वो सब बस कचरे का ढेर हों और कुछ नहीं। उनके बनाये खिलौनों से शहर केे बच्चों का बचपन आबाद हैे , उनकी बनाई मूर्तियों के बिना शहर का कोई भी पंडाल अधूरा रहता । फिर भी वो हैं बस कचरे का ढ़ेर, बेनाम बस्ती में रहने वाले बेनाम लोग । वो बेनाम बस्ती जिसे हमनें ही जन्म दिया है । और अब वो बेनाम लोग हमें आते जाते हिकारत भरी नज़रों से देखते है। शहर के सबसे पॉश इलाके में अपनी बस्ती से ऊँची ऊँची इमारतों को ठेंगा दिखाते है ।